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#Spirituality : जीवन एक स्‍कूल है और हम इसके सतत विद्यार्थी

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वास्तविकता तो यही है कि जो बीमारी है वो सिर्फ हमारा भौतिक आवरण है; हमारी आत्मा तो हमेशा पूर्ण रूप से स्वस्थ रहती है

Updated: July 20, 2018, 7:28 AM IST
संत राजिंदर सिंह जी

एक बार एक नौजवान कालेज में पढ़ने गया. वो कालेज के दूसरे विद्यार्थियों से एक बात में अलग था. उसे एक व्हीलचेयर पर कॉलेज जाना पड़ता था. परंतु उसके दिव्यांग होने के बावजूद सभी उसे बहुत पसंद करते थे. वह एक मिलनसार स्वभाव का आशावादी व्यक्ति था.

उस लड़के ने कड़ी मेहनत की और अनेक शैक्षणिक सम्मान प्राप्त किए. उसके सहपाठी उसका बहुत आदर करते थे. एक दिन उसके साथ पढ़ने वाले एक छात्र ने उससे पूछा, ‘तुम्हारी एक शारीरिक दिव्यांगता का कारण क्या है?’ उस लड़के ने उत्तर दिया, ‘मुझे बचपन में ही लकवा मार गया था.’ मित्र ने उससे पूछा, ‘तुम्हारा राज क्या है? इतने बड़े दुर्भाग्य को सहने के बावजूद तुम संसार का सामना मुस्कान और आत्मविश्वास के साथ कैसे करते हो?’ उस लड़के ने मुस्कराकर जवाब दिया, ‘उस रोग ने मेरे मन और आत्मा को कभी नहीं छुआ.’

कितनी ही बार हम स्वयं को या अपने परिवार के सदस्यों को छोटी-मोटी तकलीफों के बारे में शिकायत करते हुए देखते हैं! अपने जीवन में हमें कई शारीरिक चुनौतियों से जूझना पड़ता है. बचपन में हमें बाल्यावस्था संबंधी रोग हो जाते हैं. बाद के वर्षों में भी हमें अनेक बीमारियां झेलनी पड़ती हैं. जब कभी हम ज़्यादा खाना खा लेते हैं, तो हमारे पेट में दर्द हो जाता है. हममें से कई लोग इन बातों को लेकर बहुत पेरशान हो जाते हैं और शिकायत करते रहते हैं.

लेकिन अगर हम आसपास नजर दौड़ाएं तो देखेंगे कि कितने ही लोग गंभीर दिव्यांगताओं से पीड़ित हैं. हम देखेंगे कि किसी का कोई अंग नहीं है तो किसी को कोई जानलेवा बीमारी है. इनमें से कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो इन चुनौतियों के बावजूद जिंदगी को भरपूर जीते है. ऊपर दी गई कहानी के काॉलेज विद्यार्थी की तरह ही वे अपने शरीर की तकलीफों का असर अपने मन और आत्मा पर नहीं पड़ने देते.

हम वास्तव में आत्मा हैं. हमारा सच्चा स्वरूप आत्मिक है. शरीर केवल आत्मा के ऊपर चढ़ा आवरण है. अध्यात्म के द्वारा हम अपने सच्चे आंतरिक रूप को पहचान सकते हैं. ध्यान-अभ्यास और प्रार्थना की मदद से हम अपनी आत्मा को शरीर से अलग कर सकते हैं ताकि हम जान सकें कि हम वास्तव में हैं कौन.

हममें से कईयों के पास कारें हैं. कई बार कार खराब हो जाती है और उसे मरम्मत के लिए भेजना पड़ता है. इससे हमें चाहे थोड़े दिनों के लिए असुविधा हो और हमें किराए पर कार लेनी पड़े या हमारे परिवार के किसी सदस्य या मित्र को हमें अपनी कार में यहां-वहां घुमाना पड़े, लेकिन हमें ऐसा तो नहीं लगने लगता मानो हमारी जिंदगी ही खत्म हो गई हो. हम जानते हैं कि कार तो सिर्फ एक भौतिक साधन है जिसका इस्तेमाल हम अपने शरीर को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए करते है.

इसी तरह हमारा शरीर भी हमारी आत्मा के लिए एक भौतिक साधन ही है. कभी-कभी इसमें खराबी भी आ सकती है. लेकिन इससे हमारी आत्मा पर असर नहीं पड़ना चाहिए. हम अपने जीवन को भरपूर जी सकते हैं, चाहे हमारा भौतिक साधन खराब हो या सही.

जीवन के किसी न किसी मोड़ पर हमारे शरीर में बढ़ती आयु के चिह्न दिखने लगते हैं. हालांकि ‘जिनोम प्रोजेक्ट’ द्वारा वैज्ञानिक उस ‘जीन’ या गुणसूत्र को ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं जो आयु के बढ़ने के लिए उत्तरदायी है, और हो सकता है कि एक दिन ऐसा भी आए जब अनेक लोग सौ वर्षों से भी अधिक समय के लिए जिएं, लेकिन फिर भी ऐसा एक दिन अवश्य आता है जब हमारा शरीर उतनी अच्छी तरह काम नहीं कर पाता जितना कि युवावस्था में करता था. परंतु हमें इस बात से निराश नहीं होना चाहिए. वृद्धावस्था में कई लोगों का स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता, लेकिन यह बात उन्हें अपनी आत्मा की गहराई में शांति प्राप्त करने से रोक नहीं पाती.

इसी प्रकार हम भी शारीरिक चुनौतियों के बावजूद मानव जीवन का भरपूर लाभ उठा सकते हैं. अंतर में प्रभु के संपर्क में आकर और उनके दिव्य प्रेम का अमृत चखकर हम वो प्रेम दूसरों में भी बांट सकते हैं. ऐसा हममें में हरेक कर सकता है, चाहे हमारी शारीरिक परिस्थिति कैसी भी हो. यदि हम किसी बीमारी के कारण घर पर हैं, तो हम अपने परिवार के उन सदस्यों को प्रेम बांट सकते हैं जो हमारी देखभाल कर रहे हैं.

वास्तविकता तो यही है कि जो बीमारी है वो सिर्फ हमारा भौतिक आवरण है; हमारी आत्मा तो हमेशा पूर्ण रूप से स्वस्थ रहती है.

यदि हम कहानी के विद्यार्थी की तरह ही जीवन बिताएं, तो हम अपनी शारीरिक चुनौतियों का असर अपने मन और आत्मा पर नहीं पड़ने देंगे. एक आशावादी और सकारात्मक रवैया अपनाकर हम इन चुनौतियों पर विजय पा सकेंगे और अपने व दूसरों के जीवन में खुशियां ला सकेंगे.

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